Monday, 26 March 2012

Koyal aur Main


जब कोयल कुहुकने लगती है तो दिल के भीतर कुछ होता है . ह्रदय मानो जैसे कोई मरोड़ता हो ऐसे वो जोरजोरसे पंचम से लेकर तारसप्तक  तक कुहुकती हैऔर अचानक चुप हो जाती है. मैंने कोयल को हमेशा अपने अन्दर् महसूस किया है. जब छोटी थी तो सारे काले रंग की वजह से चिढाते या फिर ताने मारते. मुझे लगता हीं छुप जाऊं, किसीको नजर ना आऊँ. बिलकुल कोयल की तरह. मैंने मेरी इस समानता को शब्दों में ढाला औए नतीजा आप ही देख लो....                


19.11.90/Monday/ 10.30am
कोयल, तू चुप थी अच्छा था
चुप ही रह जा तो और अच्छा
अधुरा गीत तो तुने गाया
    अधुरा सपना जो तुने देखा        
वो कहानी जो रही अधूरी
तेरा घोंसला भी बना अधुरा
इन्हें पूरा करने की तमन्ना
दिलो दिमाग से निकाल दे
सपनों को घर के साथ मिटा
तेरी नन्ही को गीत ना सूना
राजा रानी की कहानी तो,
लाडली को कभी ना कह.
उसे तो कहीं और पलना है
पागल, क्यूँ कुहुकती है?
क्या तू जानती भी है?
शहजादा समुन्दर पार है,
आसमान से भी वो दूर है
और तू पेड़ों में छिपकर
दर्दभरी बिरहन गाकर
उसे बुलाये जो सुने नहीं
काहे पुकारे बार बार 
वो  मीत जो तेरा नहीं 

                                                 श्रद्धा व्यास    

No comments:

Post a Comment